Monday, October 6, 2008

चल पड़े साथ-साथ..........

हर रोज होती है मेरी मैं के साथ लड़ाई।
वो कहता है की मैं बड़ा तो वो कहता है की मैं।
इसी बहस से ही जग में होता है उजियारा।
तो इसी के साथ पसर जाता है चहूँ ओर
और अँधियारा।
चांदनी रात भी इनकी कोई चैन से नही गुजरती।
सपनों में भी ठानते हैं ये एक-दूसरे से रार।
एक दिन मैंने मैं से पूछा, बता तेरा वजूद क्या है।
झल्लाए मैं ने कहा जिस दिन मैं नही, उस
दिन तू नही।
शून्य से शिखर तक का रास्ता मेरे से ही
होकर जाता है।
जिस दिन मैंने साथ छोड़ा उस दिन तू कुछ नही।
जिसका मैं नही उसका इस धरा में कोई वजूद नही।
अब मैं ने पूछा........बता तेरी रजा क्या है।
घबराए मैंने न आव देखा न ताव....... ।
सहमा-सहमा बोला जिसका तू नही उसका
मैं नही.... ।
.........साथ ही बोला चल अपनों के लिए
तू भी समर्पित।

Friday, October 3, 2008

ख़ुद ही न कर लें मिस्टर टेन परसेंट बेडा गर्क

मार्क ट्वैन ने सच ही कहा है कि मनुष्य बुलंदी या फिर यूँ कह ले कि समृधि के शिखर पर परमेश्वर के आशीर्वाद से पहुँचता है और अपनी दुर्गति के लिए वह ख़ुद ही जिम्मेवार होता है। ऐसा ही कुछ अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान के सर्वोच्च पद पर हाल में आसीन हुए व्यक्ति के साथ देखने को मिल रहा है। और जो अभी तक नही हुआ वो आने वाले समय में हो ही जाएगा।
यहाँ बात हाल में पाक राष्ट्रपति का पद पाने वाले आसिफ अली जरदारी की हो रही है। मालूम हो की जरदारी कुछ समय पहले बम विस्फोट में मारी गयी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की नेत्री बेनजीर भुट्टो के ही पति हैं। यदि जरदारी का इतिहास खंगाला जाए तो....कुछ भी ऐसा नही मिलता है......जिसके बलबूते पाकिस्तान की अवाम अपने इस नए-नवेले राष्ट्रपति पर नाज कर सके। उल्टा इसके लिए उसे अपना सर शर्म से झुकाना पड़
सकता है। पाकिस्तान की अवाम और सियासी गलियारों में मिस्टर टेन परसेंट के नाम से जाने जाने वाले मियां जरदारी कितनी हद तक पाकिस्तान को आर्थिक और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत कर पाएंगे......ये तो अल्लाह ही जाने। मिस्टर टेन परसेंट के उपनाम से इन्हे इसीलिए जाना जाने लगा क्योंकि इनका नाम किसी भी सौदे में कम से कम दस फीसद दलाली खाने वालों की सूची में अव्वल था। अब आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं की इस समय आपका पड़ोसी मुल्क किसके हांथो में हैं। बागडोर सम्हालते ही इनकी कश्मीर को लेकर की गयी टिप्पडी को भी भारत के हित में देखना उचित नही होगा। बहरहाल अब भारत को कश्मीर मामले पर फूँक-फूँक कर कदम रखने होंगे।
जैसे हालात इस समय पाक में हैं....उन्हें देखकर तो ऐसा नही लगता की पाक की असली आवाम इनकी हरकतों को पसंद करती हो। हाल में तो अपने नवेले राष्ट्रपति की दीवानगी के ख़िलाफ़ अंदरखाते पाक की हुकूमत चला रही लाल मस्जिद ने फतवा ही निकाल दिया। मालूम हो की अपनी विदेश यात्रा के दौरान जरदारी ने अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी से उपराष्ट्रपति की उम्मीदवार सारा पालिन की सुन्दरता में इतने कसीदे पढ़ दिए की उनको इसके लिए चारो और आलोचना झेलनी पड़ी। जरदारी को कहाँ इसका अंदाजा था की सर मुंडाते ही ओले पड़ जायेंगे। शायद हो सकता हो की उनके इस कसीदे के पीछे कुछ राजनैतिक कारन भी रहे हो, लेकिन इस बात पर भी कोई संदेह नही होना चाहिए की यह सब उनकी कुर्सी और उसकी गरिमा के अनुरूप नही था।
बात शीशे की तरह साफ़ है की जितने मुश्किलात का सामना भारत को पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ के दिनों में नही करना पड़ा है, उतने ही मुश्किलातों से अब दो चार होने के लिए शांतिप्रिय भारत को अपनी कमर कस लेनी चाहिए।

.....एक नया आसमां

पता नही क्यो...नही है आदत भीड़ में खो जाने की।
भीड़ में शामिल हो... ख़ुद का वजूद मिटा देने की।
कुछ अलग करने की चाहत मन में सँजोकर।
निकल पड़े है एक नया आसमां बनाने।
उस नए आसमां में भी एक ही चाँद होगा।
अनगिनत लुभाते टिमटिमाते तारों के बीच।
जो देगा शीतलता सबको पूर्णमासी के चाँद की तरह।
अपनी फितरत में शामिल नही सफर अधूरा छोड़ना।
मिलता है सुकून मंजिल के दर पर ही पहुंचकर।
अरे सफर तो कमबख्त सफर ही होता है..........।
बोझिल
...., उबाऊ....., थकाऊ......और पकाऊ.....।
वो सफर.....सफर ही क्या, जिसमें काटों का पथ न हो।
आख़िर निकल जो पड़े हैं... एक नए आसमां
बनाने
का ख्वाब संजोये..............

Wednesday, October 1, 2008

जन्नत के साढे पाँच कदम......

अमिय बड़ा खुश था, जब से उसके कदम
जन्नत में पड़े।
कौन नही चाहता, आख़िर उसके कदम भी
जन्नत में पड़े।
जब से आँखें चार हुई, तब से जन्नत में ही
गोते लगा रहा था।
फिर क्या था, शुरू हो गया सपनो के महल
बनने का सिलसिला।
ईट भी आ गया और गारा भी, मतवाला हो
ख़ुद जुट गया महल बनाने में।
मदमस्त भोरें को जरा भी अहसास न था कि, महल
बनाने को कुछ और भी चाहिए।
मन में कुछ उलझन और बैचैनी लिए, जोड़ता
चला जा रहा था ईट से ईट।
क्या पता था अपनी धुन में रमे भोरें को
कि, उसकी नींव ही कमजोर है।
पल-पल नीचे गिरते जा रहे गारे को, उठा-उठा
कर जोड़ता चला गया।
अचानक धड़ाम कि आवाज के साथ, ज्यों ही
वो बिस्तर से नीचे गिरा।
रेत की तरह बिखर गया, बेफिक्र भोरें का
सपनो का महल..........।

...यदि लग जाए बचपन का तड़का

आज भी याद कर आंखों में हलकी सी नमी आ जाती है और होने लगती है मन में अजीब सी उथल पुथल। महीनों पहले से ही प्लानिंग बनने लगती थी कि इस बार क्या करें या न करें....। बात हो रही है त्योहारों की...उसमें किस तरह शामिल होया जाए......आख़िर मन ही तो है.....इसे कैसे समझाया जा सकता है। समझाने के कई तरीके भी है और इसे मनाने के भी लेकिन नतीजा सिफर........
मन में तरह तरह की उम्मीदें हिलोरें लेने लगती थी। अभी भी याद है जैसे ही कोई त्योहार अपनी दस्तक देता था , तो मन ही मन लड्डू फूटने लगते थे..... की इस बार तो मजा आ ही जाएगा। रात रात भर नींद नही आती थी इस बैचैनी में की कही इस बार त्योहार का रंग फीका न पड़ जाए। घर से चोरी छिपे जाकर त्योहार का लुत्फ़ उठाना। किसी त्योंहार के आते ही घर की ओर तुंरत अपना बैग उठाकर चल देना। बिना किसी फिक्र के.....मस्ती में मदमस्त होकर। बचपन के साथ साथ यदि त्योहारों को मिला दिया जाए.....तो चार चाँद लगना स्वाभाविक ही है। डाट भी पड़ती थी.....कि ऐसा मत करो और वैसा न करो....लेकिन उसका मजा भी तो अलग ही था। पर मानने वाले कहाँ थे। किसी बड़े के समझाने का असर बस थोड़ा देर ही रहता था....और उसके बाद ऐसे गायब हो जाता था...जैसे गधे के सर से सींग। एक तो त्योहारों का नशा सवार रहता था और उस पर जो बची खुची कसर रहती थी तो लग जाता तो बचपन का तड़का। फिर क्या था.......त्योहारों का मजा वो भी घर वालों के साथ डबल हो जाता था। कभी कभी कोई बड़ा आकर समझाता था कि यार अब तो आदतें बदल डालो...अब तुम लोग बड़े हो गए हो.....। और अब बड़े होने या यूँ कह ले की जब ख़ुद को यह अहसास होने लगा कि अब हम बड़े हो गए हैं तो मन में हलकी सी एक कसक लिये कि यार अब बड़े हो गए कोई भी काम करते हैं और इस तरह के काम करना हमारे बड़प्पन पर दाग लगा सकते है......बिना यह सोचे कि दाग तो चाँद में भी होता है।
सच बताऊँ तो आज की तारीख में त्योहारों के मायने ही बदल गए है। लोग भी तो बदल गए हैं। जब लोग बदल रहे हैं तो उनकी सोच बदलना भी तो जायज ही है। लेकिन सब कुछ तो नही न बदलता......सब लोग भी नही बदलते......। यही पर निदा फाजली साहब की कुछ पक्तियां याद आ रही हैं, जो कुछ इस तरह हैं...
पुरानी एक मुंडेर पर, वक्त बैठा कबूतरों को उड़ा रहा है।
कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं, कि बच्चे स्कूल जा रहे हैं।