दिल मानो थम सा गया हो....जैसे ही यह आवाज मेरे कानों तक गयी की प्रभाष जी नही रहे। गुरूवार और शुक्रवार की दरम्यानी रात कुछ ऐसा हुआ की वक्त ख़ुद ब ख़ुद मेरे सामने आकर खड़ा हो गया और बोला की पत्रकारिता के पितामह नही रहे। बीच-बीच में आँखे भी नम हो रही थी और दिल में उथल-पुथल भी हो रही थी की जिसे मैं गुरुवार की रात तहलका में(हम नमक सत्याग्रही) पढ़ रहा था....वो तैयारी कर रहा था किसी दूसरे लोक को जाने की।
जीवन में पहली बार किसी के नही रहने का आभाव महसूस हुआ। पत्रकारिता के पितामह प्रभाष जोशी नही रहे। जितनी बार ये शब्द मेरे कानों में पड़ते है....दिल मचलने लगता है और आँखे नम हो जाती है। की बोर्ड से हाथ उठकर आंखों से बह रहे आंसुओं को रोकने के लिए उठ जाते हैं। मेरा उनसे कभी इतना मेल-मिलाप नही रहा की आलोक तोमर या फिर किसी अन्य वरिष्ठ पत्रकारों की तरह मैं अपने आप को उनसे सीधा जोड़ सकूं। मेरी प्रभाष जी से मुलाकात वर्ष २००३ में वाराणसी में एक सम्मलेन के दौरान हुई थी। तब मैं इलाहबाद यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता का कोर्स कर रहा था। कितना तेज था उस चेहरे में.....क्या कड़क आवाज थी। उसी आवाज का जादू था की जीवन में एक बार, मैंने सोच लिया था की मुझे जनसत्ता में काम करने का अवसर मिल जाए। यह उनका ही आशीर्वाद रहा होगा की मेरी यह इच्छा २००७ में पूरी हुई, जब मैंने चंडीगढ़ अमर उजाला छोड़कर चंडीगढ़ में ही जनसत्ता ज्वाइन किया। अमर उजाला की चंडीगढ़ में बेहतर स्थिति थी और मुझे तब के संपादक उदय कुमार जी ने रोका भी था, लेकिन मैं अपने आप को सिर्फ़ प्रभाष जी की वजह से उस ३०० प्रतियाँ छपने वाले अखबार से ख़ुद को जोड़ना चाह रहा था, जिसका सपना मैंने २००३ में वाराणसी में देखा था। जब मेरे पास जनसत्ता का ऑफर लैटर आया तो मेरी आँखे ठीक वैसी ही नम हो गयी जैसे आज उनके इन्तिकाल की ख़बर सुनकर। दोनों में बस फर्क इतना है की वो मेरे खुशी के आंसू थे और आज जो निकल रहे हैं वो किसी, की कमी के आंसू हैं, किसी के प्रताप के आंसू है,जिनकी कमी मुझे नही लगता की कभी भर पाएगी। नमन करता हूँ प्रभाष जोशी को.....नमन करता हूँ उनके साहस को और नमन करता हूँ उन्के क्रिकेट प्रेम को। मेरे लिए उनके प्रति उपजे सम्मान को यह कहना अतिशयोक्ति नही होगी की वो एक भगवान् थे और मैं उनका भक्त। जिसके तार मन से जुड़े होते हैं...................पता नही प्रभाषजी कहाँ चले गए.....।
Thursday, November 5, 2009
Friday, August 7, 2009
जनाब ये बुतों का प्रदेश है.....
ऐसा तो सिर्फ़ आपकी बहनजी ही कर सकती हैं। पूरा सूबा सूखे की चपेट में है। कृषि प्रधान देश के महत्वपूर्व राज्य की जमीं सोना नही बल्कि पत्थर उगल रही है। पानी न मिलने की वजह से जमीने दरकने लगी है लेकिन बहनजी हैं की उनके कान में जूं तक भी नही रेंग रही। लगता है की अपने चुनाव निशान हाथी की तरह वह सिर्फ़ अपना मुह यानी ख़ुद को ही देख रही हैं, उन्हें अपने विशालकाय शरीर यानी जनता का दुःख-दर्द समझ में नही आ रहा है। न ही उसका अहसास हो पा रहा है।
भगवान् बचाए ऐसे नेताओं से जो सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के नारों के साथ सत्ता में तो आ जाते हैं, लेकिन हिताय और सुखाय से सदैव कोसों दूर भागते रहते हैं। यहाँ बात हो रही है उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की। उनके मूर्ति प्रेम और पार्क प्रेम की। मायावती ने तो हदें ही पार कर दी हैं। क्या अब उन्हें सत्ता mei अगली बार नही आना है क्या...। या फिर वो बेहतर तरीके से यह जान गयी हैं की उत्तर प्रदेश के भइया-बहनों को समझ में कुछ भी नही आने वाला। जब तक हो अपनी चला ही लो...बाद का क्या भरोसा। चुनाव के समय थोडी सी घुट्टी पिला दो, जिसका असर मतदान तक तो रहता ही रहता ही है। हाल में विधानसभा में अनुपूरक बजट पेश हुआ, जिसमे जो बातें सामने आई वो स्तब्ध कर देने वाली थी। विश्वास ही नही होता की कोई शासक अपनी जनता के लिए भला इतना कैसे निष्ठुर हो सकता है। बजट में बहनजी की तरफ़ से मूर्ति और पार्कों के लिए ४२७ करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया जबकि सूखे से निपटने के लिए २५० करोड़। अब देखिये ऐसा तो सिर्फ़ आपकी बहनजी ही कर सकती हैं। और किसी की क्या मजाल जो बेजान पत्थरों के लिए इतनी राशिः का प्रावधान करे और जान के लिए इतना कम प्रावधान। वैसे भी मैं आपको बताता चालू की इस सूबे में जान की कोई कीमत नही है। हाल में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकडों के मुताबिक पुलिस मुठभेड़ में यह सूबा और सूबों से मीलों आगे है। इससे आप सहज ही अंदाजा लगा सकेंगे की राज्य में बेजान ही बचेंगे। बोले तो बुत सिर्फ़ और सिर्फ़ बुत। आंकडों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में २००६-०७ में ८२, २००७-०८ में ४८, २००८-०९ में ४१ और वर्ष २००९-१० में २२ जुलाई तक ११ फर्जी मुठभेड़ के मामले दर्ज किए जाए है......सरकारी तौर par......। तो भला अब बताइए कौन क्या कर सकता है। बहनजी तो बहनजी ही ठहरी.....उनके साथ के लोग भी कम महान नही है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के सभापति सुखराम सिंह यादव ने प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर स्थापित महापुरुषों की मूर्तियों का तत्काल अनावरण करने के राज्य सरकार को सलाह भी दे डाली। सभापति महोदय ने कहा की सरकार महापुरुषों की स्थापित मूर्तियों का तत्काल अनावरण सुनिश्चित करे। बकौल यादव महापुरुष धर्म, वर्ग और जाती से ऊपर है...........और बेचारी जनता इन सबसे नीचे......।
देर आयद दुरुस्त आयद की तर्ज पर ही सही चुनाव आयोग ने विकास के धन से कथित तौर पर मूर्तियाँ लगाने के मामले में बहिन जी को तलब करके ठीक ही किया है। मायावती को नोटिस जारी कर १२ अगस्त तक जवाब देने के लिए कहा गया है। बहरहाल रिपोर्टों की माने तो मायावती सरकार मुख्यमंत्री की मूर्ति समेत ऐसी सरंचनाओं पर १५०० करोड़ पहले ही खर्च कर चुकी हैं....और जान बोले तो सजीव किसानों के लिए लगाये बैठें हैं आस, की खर्च कहीं से मिल जाए। मालूम हो की सूबे के ७१ में से ५८ जिले सूखे घोषित किए जा चुके हैं, लेकिन आदत है की बदलने का नाम ही नही ले रही है।
भगवान् बचाए ऐसे नेताओं से जो सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के नारों के साथ सत्ता में तो आ जाते हैं, लेकिन हिताय और सुखाय से सदैव कोसों दूर भागते रहते हैं। यहाँ बात हो रही है उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की। उनके मूर्ति प्रेम और पार्क प्रेम की। मायावती ने तो हदें ही पार कर दी हैं। क्या अब उन्हें सत्ता mei अगली बार नही आना है क्या...। या फिर वो बेहतर तरीके से यह जान गयी हैं की उत्तर प्रदेश के भइया-बहनों को समझ में कुछ भी नही आने वाला। जब तक हो अपनी चला ही लो...बाद का क्या भरोसा। चुनाव के समय थोडी सी घुट्टी पिला दो, जिसका असर मतदान तक तो रहता ही रहता ही है। हाल में विधानसभा में अनुपूरक बजट पेश हुआ, जिसमे जो बातें सामने आई वो स्तब्ध कर देने वाली थी। विश्वास ही नही होता की कोई शासक अपनी जनता के लिए भला इतना कैसे निष्ठुर हो सकता है। बजट में बहनजी की तरफ़ से मूर्ति और पार्कों के लिए ४२७ करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया जबकि सूखे से निपटने के लिए २५० करोड़। अब देखिये ऐसा तो सिर्फ़ आपकी बहनजी ही कर सकती हैं। और किसी की क्या मजाल जो बेजान पत्थरों के लिए इतनी राशिः का प्रावधान करे और जान के लिए इतना कम प्रावधान। वैसे भी मैं आपको बताता चालू की इस सूबे में जान की कोई कीमत नही है। हाल में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकडों के मुताबिक पुलिस मुठभेड़ में यह सूबा और सूबों से मीलों आगे है। इससे आप सहज ही अंदाजा लगा सकेंगे की राज्य में बेजान ही बचेंगे। बोले तो बुत सिर्फ़ और सिर्फ़ बुत। आंकडों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में २००६-०७ में ८२, २००७-०८ में ४८, २००८-०९ में ४१ और वर्ष २००९-१० में २२ जुलाई तक ११ फर्जी मुठभेड़ के मामले दर्ज किए जाए है......सरकारी तौर par......। तो भला अब बताइए कौन क्या कर सकता है। बहनजी तो बहनजी ही ठहरी.....उनके साथ के लोग भी कम महान नही है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के सभापति सुखराम सिंह यादव ने प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर स्थापित महापुरुषों की मूर्तियों का तत्काल अनावरण करने के राज्य सरकार को सलाह भी दे डाली। सभापति महोदय ने कहा की सरकार महापुरुषों की स्थापित मूर्तियों का तत्काल अनावरण सुनिश्चित करे। बकौल यादव महापुरुष धर्म, वर्ग और जाती से ऊपर है...........और बेचारी जनता इन सबसे नीचे......।
देर आयद दुरुस्त आयद की तर्ज पर ही सही चुनाव आयोग ने विकास के धन से कथित तौर पर मूर्तियाँ लगाने के मामले में बहिन जी को तलब करके ठीक ही किया है। मायावती को नोटिस जारी कर १२ अगस्त तक जवाब देने के लिए कहा गया है। बहरहाल रिपोर्टों की माने तो मायावती सरकार मुख्यमंत्री की मूर्ति समेत ऐसी सरंचनाओं पर १५०० करोड़ पहले ही खर्च कर चुकी हैं....और जान बोले तो सजीव किसानों के लिए लगाये बैठें हैं आस, की खर्च कहीं से मिल जाए। मालूम हो की सूबे के ७१ में से ५८ जिले सूखे घोषित किए जा चुके हैं, लेकिन आदत है की बदलने का नाम ही नही ले रही है।
Monday, August 3, 2009
.....हो ही गया कलियुग की राखी का स्वयंवर
आखिरकार आइटम गर्ल राखी सावंत ने अपना आइटम बॉय, बोले तो जीवनसाथी इलेश को चुन ही लिया। ये पब्लिसिटी स्टंट था या फिर २४ कैरेट सोने की तरह शुद्ध.....भगवान् ही जाने। लेकिन इतना तो तय हो ही गया है की राखी ने इस स्वयंवर से अपने आपको त्रेता युग की सीता और द्वापर युग की द्रोपदी के स्वयंवर की कतार में थोड़ा बहुत तो लाकर खड़ा कर दिया है। इस पर अब धार्मिक संगठनो को कोई बवेला खड़ा करने की कोई जरूरत नही है। और न ही मैं ऐसा लिखकर किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचा रहा हूँ।
अरे भाई....इसमे किसी को कोई आपति भी नही होनी चाहिए। जैसे-जैसे युगों के नाम और उनके चरित्र में अन्तर आया है, उस दौरान के लोगों में, राखी कलियुग में पूरी तरह फिट बैठती हैं और इसमे किसी को कोई आपत्ति भी नही होने चाहिए। विश्वास ही नही होता....आँखें झुकी हुई, चेहरे में शरमाहट और शीलता का लबादा ओढे राखी पहले जैसी २ अगस्त की रात को लग ही नही रही थी। जैसा मैं क्या, हर वो शख्स, जो थोडी बहुत टीवी का शौकीन है और उसके जरिये अपने नौटंकी के लिए प्रसिद्ध राखी को वो जानता है। अगर २ अगस्त यानी रविवार की रात वो राखी को देखता तो उसे उस पर कत्तई विश्वास ही नही होता। हया और लाज नजर आ रही थी राखी के चेहरे पर...जो अक्सर उसके चेहरे से कोसों दूर रहा करती थी। राखी के लिए तीन दूल्हों क्षितिज, इलेश और मानस को देखकर रविवार की रात एकदम यह नही लग रहा था की कुछ इनके साथ राखी बुरा-भला कर सकती है। किसी एक के गले में वरमाला डालने से पहले राखी ने भगवान् को याद किया और उनसे यह प्राथना की किवह उनके निर्णय में उसका साथ दें। राखी ने अपना स्वयंवर देख रहे लोगो को अपने चिरपरिचित अंदाज में नर्वस कर ही दिया, जब उनने वरमाला डालने के लिए ये कह दिया कि अब आगे के लिए स्वयंवर पार्ट २ में मिलते हैं। सभी थोडी देर के लिए स्तब्ध रह गए, लेकिन पल भर कि देरी किए बगैर झट में राखी ने कनाडा के इलेशपरुजन्वाला को वरमाला पहना दी। तो यह था....कलियुग का स्वयंवर, जिसका गवाह आधे से अधिक का हिंदुस्तान रहा है। यह इसीलिए क्योंकि जिसे चैनल में यह लाइव दिखाया जा रहा था, उसकी टीआरपी अब तक कि सबसे ज्यादा रही है। मतलब साफ़ है कलियुग का स्वयंवर देखने के लिए कलियुग के दर्शक ही उनकी टीआरपी बढाने में लगे थे.......शायद मेरे जैसे।
राखी का स्वयंवर होते ही उसके पुराने एकतरफा आशिक रहे मीका ने भी यह ऐलान कर डाला कि वो भी राखी कि तर्ज पर स्वयंवर नही स्वयाम्वाधू करेंगे। ये था नहले पर दहला। इतना तो तय है कि राखी ने कलियुग में स्वयंवर कर एक नयी परिपाटी तो चला ही दी है। एक अभिनेत्री अमृता राव ने भी राखी कि ही तरह स्वयंवर रचने कि अपनी इच्छा जगजाहिर कर दी है। अब देखना यह है कि कलियुग के ये स्वयंवर कितना सफल रहते हैं। क्या राखी सीता और द्रोपदी कि तरह अपने वर का हर समय साथ देती हैं या फिर ..................।
अरे भाई....इसमे किसी को कोई आपति भी नही होनी चाहिए। जैसे-जैसे युगों के नाम और उनके चरित्र में अन्तर आया है, उस दौरान के लोगों में, राखी कलियुग में पूरी तरह फिट बैठती हैं और इसमे किसी को कोई आपत्ति भी नही होने चाहिए। विश्वास ही नही होता....आँखें झुकी हुई, चेहरे में शरमाहट और शीलता का लबादा ओढे राखी पहले जैसी २ अगस्त की रात को लग ही नही रही थी। जैसा मैं क्या, हर वो शख्स, जो थोडी बहुत टीवी का शौकीन है और उसके जरिये अपने नौटंकी के लिए प्रसिद्ध राखी को वो जानता है। अगर २ अगस्त यानी रविवार की रात वो राखी को देखता तो उसे उस पर कत्तई विश्वास ही नही होता। हया और लाज नजर आ रही थी राखी के चेहरे पर...जो अक्सर उसके चेहरे से कोसों दूर रहा करती थी। राखी के लिए तीन दूल्हों क्षितिज, इलेश और मानस को देखकर रविवार की रात एकदम यह नही लग रहा था की कुछ इनके साथ राखी बुरा-भला कर सकती है। किसी एक के गले में वरमाला डालने से पहले राखी ने भगवान् को याद किया और उनसे यह प्राथना की किवह उनके निर्णय में उसका साथ दें। राखी ने अपना स्वयंवर देख रहे लोगो को अपने चिरपरिचित अंदाज में नर्वस कर ही दिया, जब उनने वरमाला डालने के लिए ये कह दिया कि अब आगे के लिए स्वयंवर पार्ट २ में मिलते हैं। सभी थोडी देर के लिए स्तब्ध रह गए, लेकिन पल भर कि देरी किए बगैर झट में राखी ने कनाडा के इलेशपरुजन्वाला को वरमाला पहना दी। तो यह था....कलियुग का स्वयंवर, जिसका गवाह आधे से अधिक का हिंदुस्तान रहा है। यह इसीलिए क्योंकि जिसे चैनल में यह लाइव दिखाया जा रहा था, उसकी टीआरपी अब तक कि सबसे ज्यादा रही है। मतलब साफ़ है कलियुग का स्वयंवर देखने के लिए कलियुग के दर्शक ही उनकी टीआरपी बढाने में लगे थे.......शायद मेरे जैसे।
राखी का स्वयंवर होते ही उसके पुराने एकतरफा आशिक रहे मीका ने भी यह ऐलान कर डाला कि वो भी राखी कि तर्ज पर स्वयंवर नही स्वयाम्वाधू करेंगे। ये था नहले पर दहला। इतना तो तय है कि राखी ने कलियुग में स्वयंवर कर एक नयी परिपाटी तो चला ही दी है। एक अभिनेत्री अमृता राव ने भी राखी कि ही तरह स्वयंवर रचने कि अपनी इच्छा जगजाहिर कर दी है। अब देखना यह है कि कलियुग के ये स्वयंवर कितना सफल रहते हैं। क्या राखी सीता और द्रोपदी कि तरह अपने वर का हर समय साथ देती हैं या फिर ..................।
Saturday, June 20, 2009
जवाबदेही तो तय होनी ही चाहिए.....
हद है भाई, तुमने तो देखकर फेक दिया। कल मुझे इसका जवाब देना होगा। कुछ ऐसी ही बातें मेरे एक पत्रकार मित्र ने बड़ी ही शिद्दत से मुझसे कहीं। असल में हुआ क्या की उनने मुझे कोई ख़बर दिखायी और मैंने उसे देखकर उसे देने के बजे पास ही टेबल में फेक दी, जिसके जवाब में उनने ये बातें मुझसे कहीं। यहाँ मैं एक चीज पूरी तरह से साफ़ कर देना चाहता हूँ की मैंने उस ख़बर को सिर्फ़ इसीलिए फेका की वह बन चुकी होगी।
मेरे दिमाग में ऐसा करने के पिच्छे सिर्फ़ और सिर्फ़ यही एक पुष्ट कारन था, जिसके जवाब में मुझे ये बातें उनकी तरफ़ से सुनने को मिली। ये कहे हुये शब्द ग़लत भी नही थे, क्योंकि यहाँ बात उनने की जवाबदेही की। जो की शनिवार को दिल्ली में शुरू हुयी भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक में बड़े ही शिद्दत के साथ बीजेपी नेता अरुण शौरी ने वहां मौजूद पार्टी जनों से कहीं। उन्होंने बड़ी ही बेबाकी से कहा की अब तो जवाबदेही तय ही की जानी चाहिए। जिनको जिम्मेदारी दी गयी, उनने अपनी जिम्मेदारी बेहतरीन तरीके से क्यों नही निभायी। काश! मेरे पत्रकार मित्र की तरह वहां भी डर किसी की दांत या फिर किसी की झिद्कन का होता। किसी ने सच ही कहा है की बिन भय होय न प्रीत। शौरी ने सीधे तरह कार्यकारिणी की बैठक से नदारद रहे अरुण जेटली पर निशाना साधते हुए कहा की यदि किसी को किसी काम की जिम्मेदारी सौपी गयी है तो, उसकी जवाबदेही भी तय की जाने चाहिए। सच भी तो है...जवाबदेही तो तय होनी ही चाहिए। बिना जवाबदेही तय किए आप कैसे किसी को आँक सकते हैं या फिर यूँ कह ले की यदि किसी को पुरुष्कृत करना है या दण्डित करना है तो उसके पिच्छे ठोस कारन इसी शब्द के रसातल में ही तो जाकर मिलते हैं। अब वक्त आ गया है की पार्टी के अन्दर हर काम की जवाबदेही तय ही होने चाहिए। शायद यदि जवाबदेही बीजेपी के राजनाथ सिंह और लाल कृष्ण अडवानी ने तय कर दी होती तो शनिवार को राजनाथ सिंह को यह नही कहना पड़ता की पार्टी में विजय और पराजय दोनों की जिम्मेदारी सामूहिक होती है, लेकिन यदि ऐसा ही है की किसी एक को ही हार की जिम्मेदारी लेनी चाहिए तो पार्टी अध्यक्ष के नाते मैं इसे स्वीकारता हूँ। जिस पर इतने दिनों से बवेला मच हुआ है, उसी को टालने के लिए राजनाथ सिंह ने ऐसी बातें कह पार्टी की बैठक में अपना बड़प्पन दिखाया है। जिसने काम नही किया, उसे प्रुश्क्रित किया गया और किसने काम किया उसे किनारे किया गया। लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बावजूद यदि बीजेपी चेतकर अपनी पार्टी में ठीक वैसे ही जवाबदेही तय नही करती, जिस तरह मेर पत्रकार मित्र की तय की गयी है तो उसे एक क्या....दो क्या...बार-बार हार के बाद आयोजित बैठक में दिग्गजों को यही बोलना पड़ेगा की हमारी सोच सिविलिज़शनल पैरामीटर की है। एक या दो चुनाव की हार हमें विचलित नही कर सकती। जरूरत है kई और हार की.....................
मेरे दिमाग में ऐसा करने के पिच्छे सिर्फ़ और सिर्फ़ यही एक पुष्ट कारन था, जिसके जवाब में मुझे ये बातें उनकी तरफ़ से सुनने को मिली। ये कहे हुये शब्द ग़लत भी नही थे, क्योंकि यहाँ बात उनने की जवाबदेही की। जो की शनिवार को दिल्ली में शुरू हुयी भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक में बड़े ही शिद्दत के साथ बीजेपी नेता अरुण शौरी ने वहां मौजूद पार्टी जनों से कहीं। उन्होंने बड़ी ही बेबाकी से कहा की अब तो जवाबदेही तय ही की जानी चाहिए। जिनको जिम्मेदारी दी गयी, उनने अपनी जिम्मेदारी बेहतरीन तरीके से क्यों नही निभायी। काश! मेरे पत्रकार मित्र की तरह वहां भी डर किसी की दांत या फिर किसी की झिद्कन का होता। किसी ने सच ही कहा है की बिन भय होय न प्रीत। शौरी ने सीधे तरह कार्यकारिणी की बैठक से नदारद रहे अरुण जेटली पर निशाना साधते हुए कहा की यदि किसी को किसी काम की जिम्मेदारी सौपी गयी है तो, उसकी जवाबदेही भी तय की जाने चाहिए। सच भी तो है...जवाबदेही तो तय होनी ही चाहिए। बिना जवाबदेही तय किए आप कैसे किसी को आँक सकते हैं या फिर यूँ कह ले की यदि किसी को पुरुष्कृत करना है या दण्डित करना है तो उसके पिच्छे ठोस कारन इसी शब्द के रसातल में ही तो जाकर मिलते हैं। अब वक्त आ गया है की पार्टी के अन्दर हर काम की जवाबदेही तय ही होने चाहिए। शायद यदि जवाबदेही बीजेपी के राजनाथ सिंह और लाल कृष्ण अडवानी ने तय कर दी होती तो शनिवार को राजनाथ सिंह को यह नही कहना पड़ता की पार्टी में विजय और पराजय दोनों की जिम्मेदारी सामूहिक होती है, लेकिन यदि ऐसा ही है की किसी एक को ही हार की जिम्मेदारी लेनी चाहिए तो पार्टी अध्यक्ष के नाते मैं इसे स्वीकारता हूँ। जिस पर इतने दिनों से बवेला मच हुआ है, उसी को टालने के लिए राजनाथ सिंह ने ऐसी बातें कह पार्टी की बैठक में अपना बड़प्पन दिखाया है। जिसने काम नही किया, उसे प्रुश्क्रित किया गया और किसने काम किया उसे किनारे किया गया। लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बावजूद यदि बीजेपी चेतकर अपनी पार्टी में ठीक वैसे ही जवाबदेही तय नही करती, जिस तरह मेर पत्रकार मित्र की तय की गयी है तो उसे एक क्या....दो क्या...बार-बार हार के बाद आयोजित बैठक में दिग्गजों को यही बोलना पड़ेगा की हमारी सोच सिविलिज़शनल पैरामीटर की है। एक या दो चुनाव की हार हमें विचलित नही कर सकती। जरूरत है kई और हार की.....................
Monday, June 15, 2009
अब यूपी की बारी है.....
सच बताऊँ तो जब से होश संभाला था, तब से यही सुनता आ रहा था कि दिल्ली के सिंघासन का रास्ता यूपी और बिहार से ही होकर जाता है। यानी यूपी हुई हमारी और अब दिल्ली की बारी है, लेकिन यह क्या यहाँ तो लाइन ही पूरी तरह से आगे पीछे हो गयी है। कांग्रेस का रीवैवल प्लान काफी हद तक उसके लिए इस बार के आम चुनावों में मददगार साबित हुआ। तो क्या यह भी कांग्रेस के रीवैवल प्लान का ही हिस्सा है कि उसने सत्ता के गलियारों में अक्सर गूंजने वाली उपरोक्त लाइनों को उल्टा कर दिया।
जी हाँ....हाल में हुए लोकसभा चुनावों में अपनी जीत का परचम लहरा चुकी कांग्रेस यूपी हुई हमारी है अब दिल्ली की बारी है को पूरी तरह ग़लत साबित करते हुए द्लीली हुई हमारी है आयर अब यूपी कि बारी है कि तर्ज पर यूपी में खोया अपना जनाधार पन्ने के लिए दिल्ली से कूच कर चुकी है। पार्टी स्तर पर भी इस बात को काफ़ी गंभीरता से लिया जा रहा है कि २०१२ में यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनावों में वह इस बार से बहुत ज्यादा संख्या में उभरे ताकि भारतीय लोकतंत्र के आसमान में खो चुके अपने वजूद को वह वापस ला सके। वैसे भी पूरी तरह से इस बार के रीवैवल प्लान का श्रेय कांग्रेस के ब्रांड राहुल को ही जाता है। उनने ही लोकसभा चुनाव में यूपी और बिहार में बिना क्षेत्रीय दलों के चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया था। यानी यह कहना राहुल का ही है कि पहले ख़ुद को आजमाएंगे, फिर जरूरत पड़ी तो गठबंधन धर्म निभाएंगे। और राहुल बाबा का यही फार्मूला उन्हें और उनकी पार्टी के सीए ताज बाँध गया। कांग्रेस ने हाल में यह फ़ैसला लिया है कि वह राहुल का जन्म दिन, जो कि १९ जून को पड़ता है, को यूपी में सभी जाती के लोगों के साथ मिलकर मनायेगी। ताकि इससे मायावती के सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले को वह झटककर विधान सभा चुनाव में सफलता का स्वाद चख सके और उसके बाद वह इसका इस्तेमाल करे दिल्ली के सिंघासन के लिए। यूपी में अब बसपा के बाद कांग्रेस ने भी सोशल इंजीनियरिंग का रास्ता काफ़ी हद तक चुन लिया है। पार्टी राहुल के जन्मदिन के अवसर पर बसपा की वोट बैंक में सेंध लगाने की योजना बना रही है। इसके तहत राहुल के जन्मदिन को समरसता दिवस के रूप में भी मनाने कि योजना है। बताया जाता है कि प्रदेश कांग्रेस १९ जून को राहुल के जन्मदिन पर दलित बहुल इलाकों में सामुदायिक समारोहों का आयोजन करेगी और इस दिन सहभोग भी आयोजित किए जायेंगे, जिनमे पार्टी जनों के आलावा सभी समुदायों के लोगों को आमंत्रित किया जाएगा। मालूम हो कि हाल के आम चुनाव परिणामों से उत्साहित कांग्रेस पहले भी बेबाक तरीके से कह चुकी है कि वह २०१२ में होने वाले विधानसभा चुनाव में प्रदेश अपनी सफलता बनने के लिए कोई कोर कसार नही छोडेगी। यूपी तो यूपी ही है, बिहार के विस चुनाव के लिए भी जीत से लबरेज कांग्रेस ने कमर कास ली है और आम चुनाव कि तर्ज पर उसने यह भी कह डाला है कि २०१० के चुनाव में वह पूरी तरह से बिहार में अकेले चुनाव लडेगी।
हालाँकि राहुल ने यह भी एक बार स्वीकार किया था कि अगर कांग्रेस अपने दम पर केन्द्र में सत्ता में आना चाहती है तो उसे यूपी में सबसे ज्यादा सीट हासिल करनी होगी। बहरहाल कांग्रेस ने यह दांव उस समय खेला है, जब पिछले २० वर्षों से प्रदेश मी हाशियें पर गयी पार्टी ने हाल में लोकसभा चुनाव में राज्य में एक बार फिर अपने कदम मजबूत किए हैं। इससे एक बार फिर एकला चलो कि रणनीति को बल मिलता है।
जी हाँ....हाल में हुए लोकसभा चुनावों में अपनी जीत का परचम लहरा चुकी कांग्रेस यूपी हुई हमारी है अब दिल्ली की बारी है को पूरी तरह ग़लत साबित करते हुए द्लीली हुई हमारी है आयर अब यूपी कि बारी है कि तर्ज पर यूपी में खोया अपना जनाधार पन्ने के लिए दिल्ली से कूच कर चुकी है। पार्टी स्तर पर भी इस बात को काफ़ी गंभीरता से लिया जा रहा है कि २०१२ में यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनावों में वह इस बार से बहुत ज्यादा संख्या में उभरे ताकि भारतीय लोकतंत्र के आसमान में खो चुके अपने वजूद को वह वापस ला सके। वैसे भी पूरी तरह से इस बार के रीवैवल प्लान का श्रेय कांग्रेस के ब्रांड राहुल को ही जाता है। उनने ही लोकसभा चुनाव में यूपी और बिहार में बिना क्षेत्रीय दलों के चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया था। यानी यह कहना राहुल का ही है कि पहले ख़ुद को आजमाएंगे, फिर जरूरत पड़ी तो गठबंधन धर्म निभाएंगे। और राहुल बाबा का यही फार्मूला उन्हें और उनकी पार्टी के सीए ताज बाँध गया। कांग्रेस ने हाल में यह फ़ैसला लिया है कि वह राहुल का जन्म दिन, जो कि १९ जून को पड़ता है, को यूपी में सभी जाती के लोगों के साथ मिलकर मनायेगी। ताकि इससे मायावती के सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले को वह झटककर विधान सभा चुनाव में सफलता का स्वाद चख सके और उसके बाद वह इसका इस्तेमाल करे दिल्ली के सिंघासन के लिए। यूपी में अब बसपा के बाद कांग्रेस ने भी सोशल इंजीनियरिंग का रास्ता काफ़ी हद तक चुन लिया है। पार्टी राहुल के जन्मदिन के अवसर पर बसपा की वोट बैंक में सेंध लगाने की योजना बना रही है। इसके तहत राहुल के जन्मदिन को समरसता दिवस के रूप में भी मनाने कि योजना है। बताया जाता है कि प्रदेश कांग्रेस १९ जून को राहुल के जन्मदिन पर दलित बहुल इलाकों में सामुदायिक समारोहों का आयोजन करेगी और इस दिन सहभोग भी आयोजित किए जायेंगे, जिनमे पार्टी जनों के आलावा सभी समुदायों के लोगों को आमंत्रित किया जाएगा। मालूम हो कि हाल के आम चुनाव परिणामों से उत्साहित कांग्रेस पहले भी बेबाक तरीके से कह चुकी है कि वह २०१२ में होने वाले विधानसभा चुनाव में प्रदेश अपनी सफलता बनने के लिए कोई कोर कसार नही छोडेगी। यूपी तो यूपी ही है, बिहार के विस चुनाव के लिए भी जीत से लबरेज कांग्रेस ने कमर कास ली है और आम चुनाव कि तर्ज पर उसने यह भी कह डाला है कि २०१० के चुनाव में वह पूरी तरह से बिहार में अकेले चुनाव लडेगी।
हालाँकि राहुल ने यह भी एक बार स्वीकार किया था कि अगर कांग्रेस अपने दम पर केन्द्र में सत्ता में आना चाहती है तो उसे यूपी में सबसे ज्यादा सीट हासिल करनी होगी। बहरहाल कांग्रेस ने यह दांव उस समय खेला है, जब पिछले २० वर्षों से प्रदेश मी हाशियें पर गयी पार्टी ने हाल में लोकसभा चुनाव में राज्य में एक बार फिर अपने कदम मजबूत किए हैं। इससे एक बार फिर एकला चलो कि रणनीति को बल मिलता है।
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