Saturday, January 9, 2010

बहुतों को मैंने बदलते देखा है...

बहुतों को मैंने बदलते देखा है।
सेकेंडों को मिनटों बनते देखा है।।

जिनके पास था कभी मिनटों का जवाब।
उनको घंटों में बदलते देखा है।।

पलों को गिनने की तो आदत मेरी ही थी।
आज वही आदत मेरे लिए नासूर बन गई ।।

किये थे वादे हर वक्त साथ निभाने के।
आज देखा है उन्ही को टूटते हुए।।

टूटने का सिलसिला तो तब से ही शुरू हुआ।
जब से मैंने उनके टूटे दिल को रफ्ता-रफ्ता जोड़ा था।।

धूल के उड़ते हुए कणों की तरह।
मैंने उनके मिनटों को हवा में उड़ते हुए देखा है।।

बहुतों को मैंने बदलते देखा है।
सेकेंडों को मिनटों बनते देखा है।।

Friday, December 11, 2009

साजिश नए सिंहासन की

जिसका डर था आखिर वही हुआ...फिर बंटेगा यूपी। अपनी तेजी के लिए जाने जाने वाली उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने उत्तर प्रदेश को बांट दिया। इस बार भी सदियों से सुनाई देने वाला नारा लखनऊ की प्रेस कॉन्फ्रेंस में गूंजा कि भाई तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं। सूबे को बांटने के लिए हम पूरी तरह से तैयार हैं और हमारे लोग भी। बस देर कर रही है तो केंद्र की सत्तासीन कांग्रेस सरकार। मैं जनता के साथ हूं....जनता जो कहेगी...वो मैं करूंगी। मैं हमेशा से छोटे राज्यों के पक्ष में रही हूं। छोटा राज्य बोले तो बहेगी उसमें विकास की गंगा।

शायद
... भूलना मुश्किल है
मैं अपनी उम्र के 26वें पड़ाव में आकर आज भी एक झटके में यह बोल जाता हूं कि देहरादून तो उत्तर प्रदेश में ही आता है, एक पत्रकार होने के बावजूद भी। यहां पत्रकार शब्द पर ज्यादा जोर इसलिए दे रहा हूं कि कहा जाता है कि इनकी याददाश्त ज्यादा तेज होती है या फिर ये कुछ ज्यादा ही अपडेट होते हैं। फिर झट से अपनी गलती को, जो मेरी जिह्वा और मानस पटल में जम चुकी है, को सुधारने की कोशिश करते हुए बोलता हूं कि देहरादून उत्तराखंड की राजधानी है, जो कब का अलग हो चुका है....उत्तर प्रदेश से। खींच दी गई हैं सरहदों में लकीरें...जो शायद सिर्फ इंसानों के लिए हैं, परिंदों के लिए नहीं।

आदत डाल ही लेनी चाहिए
बंटवारे से मुझे काफी डर लगता है। कारण कुछ और नहीं बल्कि मेरी सबको साथ लेकर चलने की आदत है। सबके साथ रहने की आदत....ये बुरी आदत भी इसीलिए पड़ गई कि मेरा बचपन एक संयुक्त परिवार में बीता है। जिसे अक्सर इंतजार रहता था अपने बड़े परिवार के सदस्यों के आने का, जो कि आज की तारीख में काफी हद तक खत्म हो चुका है। उत्तराखंड की तरह शायद अब मैं हरित प्रदेश, बुंदेलखंड और पूर्वांचल को भी अपने चित्त में बैठाने की आदत डाल ही लूं। लेकिन क्या में आपके सामने अपने प्रदेश का नाम बताने में गल्तियां नहीं करूंगा....यूपी की जगह बुंदेलखंड बोलने की आदत डाल लेनी चाहिए।

तो क्या अब वो बुंदेलखंडी बोलेगा
अगर सूबे की मुखिया मुख्यमंत्री मायावती की योजना परवान चढ़ गई और वहां की मासूम जनता उनके बहकावे में आ गई तो मैं अपने आपको कहां का बोलूंगा और लोग मुझे क्या कहकर पुकारेंगे....बाहर जाने पर। मुझे अभी भी यूपी का भइया ही अपने आप को कहलाना पसंद है। मैंने कुछ समय के लिए चंडीगढ़ में पत्रकारिता की, जहां यूपी और बिहारवालों को भइया कहा जाता है। मुझे भी मेरे एक मित्र ने भइया कहा था। उसका कोई गलत मंतव्य नहीं था, इसे कहने को लेकर...मजाक में या फिर जब उसे मुझ पर लाड़ आता था। तो क्या अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो वो मुझे अब बुंदेलखंडी बोलेगा...।

टूटे-फूटे जुड़ाव की साजिश
केंद्र सरकार की ओर से आधी रात को तेलंगाना को पृथक राज्य बनाने की घोषणा और उसके तुरंत बाद मायावती का उत्तर प्रदेश के एक नहीं कई टुकड़े करने की लालसा के पीछे आखिर क्या पेंच है। इसको सिर्फ विकास के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। यह कुछ नहीं एक सियासी चाल है...जनता से टूटे-फूटे जुड़ाव की एक साजिश है, जिसके जरिए वो अगला सिंहासन पाने का सपना देख रही हैं। आज के परिप्रेक्ष्य में थोड़ा गुणाभाग करके देखा जाए तो मायावती की पूर्वांचल और बुंदेलखंड में काफी कम पकड़ है। पश्चिमी उप्र में अजित सिंह की अच्छी खासी पकड़ है, जबकि बुंदेलखंड में कांग्रेस उभरी है।

कांग्रेस का बंटाधार करने का इरादा
सूबे के टुकड़े-टुकड़े करने के उनके बयान से सबसे ज्यादा यदि किसी को क्षति पहुंचाने की कोशिश की गई है, तो वो सिर्फ कांग्रेस को ही। क्योंकि उप्र में इस समय कांग्रेस जी-तोड़ कोशिश में जुटी हुई है अपने आप को मजबूत करने में। अपनी बेअंदाजी के लिए जाने जाने वाली मायावती ने यह कहकर तो पूरी तरह उन लोगों की सहानुभूति अपने पक्ष में कर ली है, जिनने टुकड़े-टुकड़े करने का इरादा पाल रखा है। लेकिन ऐसा बयान देकर और यह बोलकर कि केंद्र पहल करे, हम पूरी तरह से तैयार है....सत्तासीन कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने की सीधी-सीधी कोशिश की गई है।

सिर से आंखें निकाल लो और नाक

ठीक किया केंद्र ने के। चंद्रशेखर राव की मांग मानकर। अव्वल दर्जे का काम किया है केंद्र सरकार ने देश में 29वें राज्य का गठन करके। शायद यह विकास के लिए सही भी है। एक व्यक्ति के शरीर के जितने अधिक से अधिक टुकड़े किए जाएंगे, उतना तेज ही उसका विकास होगा और उतनी ही तेजी से उसमें निखार आएगा। आंध्र के दो टुकड़े बुधवार की देर रात कर दिए गए...और मिल गई तेलंगाना राज्य को मंजूरी।

धड़ को नोचना शुरू कर दो
विकास की दृष्टि से शरीर को भी बांटने में कोई गुरेज नहीं करना चाहिए। पहले सिर अलग करो और धड़। फिर सिर से आंखें निकाल लो और नाक। इस पर भी किसी ने आमरण अनशन की धमकी दे दी तो फिर धड़ को नोचना शुरू कर दो। अरे भाई.... आपको मालूम नहीं कि इससे विकास तेज होता है। आधारभूत ढांचे में बड़ी जल्दी सुधार भी आता है और नए राज्यों से जुड़े नेताओं के बैंक बैलेंस में भी। तेलंगाना के गठन के बाद और राज्यों में भी बंटवारे की राजनीति सुलगने लगी है। केंद्र सरकार तेलंगाना राज्य के गठन पर सहमत हो गई है लेकिन उसके समक्ष नौ अन्य नए राज्यों के गठन की मांग जोर पकडऩे लगी है।

ये देखिए अब आया गोरखालैंड
पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड, बिहार में मिथिलांचल, कर्नाटक में कुर्ग, उत्तरप्रदेश और मप्र के कुछ हिस्सों को मिलाकर बुंदेलखंड राज्य और गुजरात में सौराष्ट्र के गठन की मांग है। ये देखिए विकास की रफ्तार इतनी तेज हो गई कि मेरे लिखते-लिखते ही खबर आ गई कि गोरखालैंड की मांग कर रहे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने भी अब राव के बाद अनिश्चिकाल के लिए अनशन पर जाने की चेतावनी दे दी है। यह ऐलान मोर्चा के महासचिव रोशन गिरी ने किया। बकौल गिरी यदि जल्द ही इस बाबत कुछ कदम नहीं उठाए गए तो उनके 21 युवा कार्यकर्ता आमरण अनशन पर चले जाएंगे....। लीजिए अब इनसे भी निपटिए।

तभी गिनते रह जाओगे
नया राज्य बनेगा। चारों तरफ से पैसों की बरसात होगी....मलाईदार पदों पर बैठे नेता और उनके शागिर्द नए नवेले राज्य का विकास करने के बजाए जुट जाएंगे अपना विकास करने में। पैसा तो आना ही चाहिए...चाहे वो राज्य के विकास के लिए हो या फिर अपने विकास के लिए। राज्य का विकास कौन देखता है, अपना विकास है तो राज्य का विकास ही होगा। यहां ये नेता भूल जाते हैं कि जब हम सुधरेंगे तो ही धीरे-धीरे राज्य भी सुधरेगा और देश भी। तभी तो देखिए हनी के पास कितना मनी है....गिनते रह जाओगे।

शायद अब वो दिन दूर नहीं रह जाएगा, जब हर एक शहर प्रदेश होगा और हर शहर के मोहल्ले उस प्रदेश के जिले होंगे। और प्रदेश के नाम पर कम बढ़ती नेताओं और उनके शागिर्दों की फौज पर आपका खून पसीना बेतरतीब तरीके से बहाया जाएगा।

Thursday, November 5, 2009

पता नही, कहाँ चले गए...

दिल मानो थम सा गया हो....जैसे ही यह आवाज मेरे कानों तक गयी की प्रभाष जी नही रहे। गुरूवार और शुक्रवार की दरम्यानी रात कुछ ऐसा हुआ की वक्त ख़ुद ब ख़ुद मेरे सामने आकर खड़ा हो गया और बोला की पत्रकारिता के पितामह नही रहे। बीच-बीच में आँखे भी नम हो रही थी और दिल में उथल-पुथल भी हो रही थी की जिसे मैं गुरुवार की रात तहलका में(हम नमक सत्याग्रही) पढ़ रहा था....वो तैयारी कर रहा था किसी दूसरे लोक को जाने की।

जीवन में पहली बार किसी के नही रहने का आभाव महसूस हुआ। पत्रकारिता के पितामह प्रभाष जोशी नही रहे। जितनी बार ये शब्द मेरे कानों में पड़ते है....दिल मचलने लगता है और आँखे नम हो जाती है। की बोर्ड से हाथ उठकर आंखों से बह रहे आंसुओं को रोकने के लिए उठ जाते हैं। मेरा उनसे कभी इतना मेल-मिलाप नही रहा की आलोक तोमर या फिर किसी अन्य वरिष्ठ पत्रकारों की तरह मैं अपने आप को उनसे सीधा जोड़ सकूं। मेरी प्रभाष जी से मुलाकात वर्ष २००३ में वाराणसी में एक सम्मलेन के दौरान हुई थी। तब मैं इलाहबाद यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता का कोर्स कर रहा था। कितना तेज था उस चेहरे में.....क्या कड़क आवाज थी। उसी आवाज का जादू था की जीवन में एक बार, मैंने सोच लिया था की मुझे जनसत्ता में काम करने का अवसर मिल जाए। यह उनका ही आशीर्वाद रहा होगा की मेरी यह इच्छा २००७ में पूरी हुई, जब मैंने चंडीगढ़ अमर उजाला छोड़कर चंडीगढ़ में ही जनसत्ता ज्वाइन किया। अमर उजाला की चंडीगढ़ में बेहतर स्थिति थी और मुझे तब के संपादक उदय कुमार जी ने रोका भी था, लेकिन मैं अपने आप को सिर्फ़ प्रभाष जी की वजह से उस ३०० प्रतियाँ छपने वाले अखबार से ख़ुद को जोड़ना चाह रहा था, जिसका सपना मैंने २००३ में वाराणसी में देखा था। जब मेरे पास जनसत्ता का ऑफर लैटर आया तो मेरी आँखे ठीक वैसी ही नम हो गयी जैसे आज उनके इन्तिकाल की ख़बर सुनकर। दोनों में बस फर्क इतना है की वो मेरे खुशी के आंसू थे और आज जो निकल रहे हैं वो किसी, की कमी के आंसू हैं, किसी के प्रताप के आंसू है,जिनकी कमी मुझे नही लगता की कभी भर पाएगी। नमन करता हूँ प्रभाष जोशी को.....नमन करता हूँ उनके साहस को और नमन करता हूँ उन्के क्रिकेट प्रेम को। मेरे लिए उनके प्रति उपजे सम्मान को यह कहना अतिशयोक्ति नही होगी की वो एक भगवान् थे और मैं उनका भक्त। जिसके तार मन से जुड़े होते हैं...................पता नही प्रभाषजी कहाँ चले गए.....।

Friday, August 7, 2009

जनाब ये बुतों का प्रदेश है.....

ऐसा तो सिर्फ़ आपकी बहनजी ही कर सकती हैं। पूरा सूबा सूखे की चपेट में है। कृषि प्रधान देश के महत्वपूर्व राज्य की जमीं सोना नही बल्कि पत्थर उगल रही है। पानी न मिलने की वजह से जमीने दरकने लगी है लेकिन बहनजी हैं की उनके कान में जूं तक भी नही रेंग रही। लगता है की अपने चुनाव निशान हाथी की तरह वह सिर्फ़ अपना मुह यानी ख़ुद को ही देख रही हैं, उन्हें अपने विशालकाय शरीर यानी जनता का दुःख-दर्द समझ में नही आ रहा है। न ही उसका अहसास हो पा रहा है।

भगवान् बचाए ऐसे नेताओं से जो सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के नारों के साथ सत्ता में तो आ जाते हैं, लेकिन हिताय और सुखाय से सदैव कोसों दूर भागते रहते हैं। यहाँ बात हो रही है उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की। उनके मूर्ति प्रेम और पार्क प्रेम की। मायावती ने तो हदें ही पार कर दी हैं। क्या अब उन्हें सत्ता mei अगली बार नही आना है क्या...। या फिर वो बेहतर तरीके से यह जान गयी हैं की उत्तर प्रदेश के भइया-बहनों को समझ में कुछ भी नही आने वाला। जब तक हो अपनी चला ही लो...बाद का क्या भरोसा। चुनाव के समय थोडी सी घुट्टी पिला दो, जिसका असर मतदान तक तो रहता ही रहता ही है। हाल में विधानसभा में अनुपूरक बजट पेश हुआ, जिसमे जो बातें सामने आई वो स्तब्ध कर देने वाली थी। विश्वास ही नही होता की कोई शासक अपनी जनता के लिए भला इतना कैसे निष्ठुर हो सकता है। बजट में बहनजी की तरफ़ से मूर्ति और पार्कों के लिए ४२७ करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया जबकि सूखे से निपटने के लिए २५० करोड़। अब देखिये ऐसा तो सिर्फ़ आपकी बहनजी ही कर सकती हैं। और किसी की क्या मजाल जो बेजान पत्थरों के लिए इतनी राशिः का प्रावधान करे और जान के लिए इतना कम प्रावधान। वैसे भी मैं आपको बताता चालू की इस सूबे में जान की कोई कीमत नही है। हाल में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकडों के मुताबिक पुलिस मुठभेड़ में यह सूबा और सूबों से मीलों आगे है। इससे आप सहज ही अंदाजा लगा सकेंगे की राज्य में बेजान ही बचेंगे। बोले तो बुत सिर्फ़ और सिर्फ़ बुत। आंकडों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में २००६-०७ में ८२, २००७-०८ में ४८, २००८-०९ में ४१ और वर्ष २००९-१० में २२ जुलाई तक ११ फर्जी मुठभेड़ के मामले दर्ज किए जाए है......सरकारी तौर par......। तो भला अब बताइए कौन क्या कर सकता है। बहनजी तो बहनजी ही ठहरी.....उनके साथ के लोग भी कम महान नही है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के सभापति सुखराम सिंह यादव ने प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर स्थापित महापुरुषों की मूर्तियों का तत्काल अनावरण करने के राज्य सरकार को सलाह भी दे डाली। सभापति महोदय ने कहा की सरकार महापुरुषों की स्थापित मूर्तियों का तत्काल अनावरण सुनिश्चित करे। बकौल यादव महापुरुष धर्म, वर्ग और जाती से ऊपर है...........और बेचारी जनता इन सबसे नीचे......।

देर आयद दुरुस्त आयद की तर्ज पर ही सही चुनाव आयोग ने विकास के धन से कथित तौर पर मूर्तियाँ लगाने के मामले में बहिन जी को तलब करके ठीक ही किया है। मायावती को नोटिस जारी कर १२ अगस्त तक जवाब देने के लिए कहा गया है। बहरहाल रिपोर्टों की माने तो मायावती सरकार मुख्यमंत्री की मूर्ति समेत ऐसी सरंचनाओं पर १५०० करोड़ पहले ही खर्च कर चुकी हैं....और जान बोले तो सजीव किसानों के लिए लगाये बैठें हैं आस, की खर्च कहीं से मिल जाए। मालूम हो की सूबे के ७१ में से ५८ जिले सूखे घोषित किए जा चुके हैं, लेकिन आदत है की बदलने का नाम ही नही ले रही है।