Monday, December 1, 2008

...नहीं यूँ ही जीते रहेंगे संगीनों के साए में

शहीदों की चिताओं पर लगेगें हर बरस मेले।
बाकी यहींमरने वालों का नाम निशां होगा।

सलाम खुल्लम खुल्ला का उन शहीदों को जिनने हमारी सुरक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे डाली। ख़त्म कर डाला उन दहशतगर्दों को, जो पिछले ६० घंटों से दिन-रात या फिर यूँ कह ले की कभी न थमने वाली आमची मुंबई में मौत का नंगा नाच खेल रहे थे। नाज है हमें अपने उन शहीद हुए २० जवानो समेत काल के गाल में समां चुके १८० लोगों पर।

वास्तव
में हाल में मुंबई में हुए देश के अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमलों ने आम आदमी तक को हिला दिया है। इस हमले ने इस कदर भारत में रह रहे लोगों के दिलों में भय का बीज बो दिया है, जिसे अब आसानी से तो नही ही हटाया जा सकता। हर एक भारतवासी यह सोच रहा है की क्या वह सुरक्षित है....क्या वह इस वतन में सुख-चैन की साँस ले सकता हैं....शायद नही। २६ नवम्बर को रात १० बजे से लेकर २९ नवम्बर की सुबह ११ बजे तक जो खूनी खेल भारत की आर्थिक राजधानी पर चल रहा था, उसकी कल्पना करते ही रूह कांपने लगती है। यहाँ यह सवाल पैदा हो रहा है की आख़िर चूक किसकी है। किसकी गलती का खामियाजा इन बेगुनाह १८० लोगों को मिला है.....और जो असुरक्षा की भावना लोगों में घर कर गयी है, वह आख़िर कैसे मिटेगी। मुंबई के कोलाबा के मच्छीमार इलाके में २६ नवम्बर की सुबह यदि स्थानीय लोगों की मानें तो उन्होंने इन दहशतगर्दों को नाव से भारी समान के साथ उतरते देखा था। इनको देखकर वहां के कुछ लोगों ने इनसे यह सवाल भी दागा था की...भाई आप लोग कौन हैं। लेकिन इन्हे बजाय सही जवाब मिलने के उत्तर यह मिला की तुम लोग अपना काम करो। तुम लोगों से मतलब की हम लोग कौन हैं। इस पर स्थानीय लोगों को कुछ संदेह हुआ और इसकी जानकारी पास की पुलिस चोकी को दी गयी, लेकिन कोई भी कदम उठाने के बजाय पुलिस वालों ने इनकी बात को भी पूरी तरह से अनसुना कर दिया। यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है की आख़िर चूक किसकी है। यहाँ स्थानीय लोगों ने तो अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभायी, लेकिन जिसे निभाने का पैसा दिया जा रहा है....उनके कानों में जू तक नही रेंगी। जिसका खामियाजा भुगतना पड़ा बेचारे बेगुनाह लोगों को।

६०
घंटों तक पूरा देश दहशत के साए में जीने को मजबूर हुआ। और अब भी कोई उनसे डर कोई कोसों दूर नही भाग खड़ा हुआ है। मंडरा रहा है अब भी आतंकी खतरा बेगुनाहों के सर के ऊपर, लेकिन राजनेता हैं की बाज आने को मजबूर ही नही हो रहे हैं। इस मौके पर भी हमारे राजनेता समस्या हल करने के बजाय एक-दूसरे पर आरोप लगाने से बाज नही आ रहे हैं।
कहाँ गयी राज की बहादुर सेना...जवाब चाहिये:
जिन मुंबई दहशतगर्दों से जूझ रही थी.....लोगों के मोबाइल पर एक मेसेज लगातार दौड़ रहा था की, आख़िर कहाँ चुप गए हैं राज के कथित बहादुर मानुष। उत्तर भारतियों पर कहर बरपा रहे मानुषों को चढ़ जन चाहिए था मुंबई की शान ताज पर, यहूदियों के शरणगाह नरीमन हाउस पर। और देना चाहिए था मुहतोड़ जवाब पकिस्तान से आए दरिंदों को। अब भी समझ जाइये राज ठाकरे जी........उत्तर भारतियों पर कहर बरपाना छोड़ बरसाएं अपना कहर आतंकवादियों पर, जो तुले हुए हैं देश का माहौल बिगाड़ने पर।
क्यों नही दिए जा रहे नए हथियार:
आतंकवादियों को मुहतोड़ जवाब देने के लिए हमारे सुरक्षाकर्मियों के पास आधुनिक हथियार नही है। क्यों वे लोग खस्ताहाल हथियारों से दहशतगर्दों से लड़ने को मजबूर हो रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों को खंगालने से पता चलता है की उनके पास जो भी हथियार है, uन पर भी जंग लग चुका है। कुछ ने तो यहाँ तक कहाँ की हमारे पास बुल्लेत्प्रूफ़ जैकेट का भी आकाल है। तो भला बताएं हमारे जवान कैसे प्लास्टिक बम का सामना कर सकेंगे, कैसे वो हर तरह से लैस दहशतगर्दों से निपटेगी। सब कुछ ख़राब हो चुका है, यह तंत्र भी और ये नेता भी।
कैसे लौटेंगे हमारे शहीद...जवाब चाहिए:
क्या किसी भी राजनेता के पास इस बात का जवाब है की हमारे शहीद हुए जवान और बेगुनाह लोग कैसे वापस लौटेंगे....शायद नही है इनके पास कोई जवाब। कैसे भरेगी किसी की उजड़ चुकी मांग...कैसे भरेगी किसी माँ की गोद। इन सब सवालों का तो किसी के पास जवाब ही नही है। ऐसे मौके पर सान्तवना देने के बजाय राजनेता जुट गए हैं एक दूसरे की बखिया उधेड़ने में। और शुरू हो गया है बेकार के आरोप-प्रत्यारोपों का दौर।
तो हम क्या करें.....जवाब चाहिए:
आतंकी हमलों के दौरान ख़ुद अमिताभ इतना सहम गए थे की, उनने अपनी तकिया के निचे पिस्टल राखी...और तब जाकर उन्हें नीद आए॥वह भी आधी-अधूरी। देश के जब महानायक का यह हाल है, तो भला आप ही बताइए की आप और हम कैसे जियेंगे। किसके सहारे हम रहेंगे...कौन करेगा हमारी सुरक्षा। राजनेताओं की बड़ी-बड़ी बातें करेंगी हमारी सुरक्षा। हटा देनी चाहिए इनकी सुरक्षा। क्या आम आदमी से बड़ा कोई राजनेता है...शायद नही। शायद क्या॥है ही नही।

शर्म
आती है बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार लाल कृष्ण अडवानी के वक्तव्य पर। उन्होंने कहा की इन हमलों के बाद अब कांग्रेस सरकार को इस्तीफा दे देना चाहिए। मैं यहाँ किसी का बचाव नही कर रहा हूँ, बस अडवानी जो को यह याद दिला रहा हूँ की उनकी पार्टी के कार्यकाल में तो संसद भवन पर हमला हुआ था, तब क्या हुआ था श्रीमान जी। और आप इसी आधार पर जनता से एक और मौका मांग रहे हैं......शर्म आनी चाहिए श्रीमानजी आपको। बस अब हमें और कोई वादे नही, कोई दिलासा नही....सीधे-सीधे कारर्वाई चाहिए। एक बार फिर सलाम अपने जांबाज जवानों और भाइयों पर.............आतंकी हमले क्यों नही हो रहे हैं बंद...इसका जवाब चाहिए...... ।

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